ऐसे-वैसे, जैसे भी हो सत्ता चाहिए!

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ऐसे-वैसे, जैसे भी हो सत्ता चाहिए। जी हां, हर पार्टी का अब यही मूलमंत्र है। भाजपा भी अब यही कर रही है। उसे भी 2019 में सत्ता चाहिए। सच तो यही है। भाजपा के ईमानदार कार्यकर्ता, जो सवर्ण जाति से हैं, अब वे दूध की मक्खी हो गए हैं। सुबह से लेकर रात तक जय श्रीराम, नरेंन्द्र मोदी जिंदाबाद, अमित शाह जिंदाबाद करने वाले कार्यकर्ता की अब कोई सुनने वाला नहीं है। वर्ष 2014 में जिन कार्यकर्ताओं के बल बूते सत्ता का स्वाद भाजपा ने चखा था, आज उसी पार्टी के शीर्ष नेताओं ने उनसे किनारा कर लिया है। उसे उसके हाल पर छोड़ दिया है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व 2019 में दलितों के दम पर सत्ता पर काबिज होने की जुगत में लगी है। इसलिए भाजपा के सवर्ण और ईमानदार कार्यकर्ताओं को अब नए सिरे से सोचना होगा कि जिस भाजपा को वे खाद-पानी देकर इतनी शिद्दत से सींचा था, क्या यह वही भाजपा है? क्या भाजपा के ईमानदार कार्यकर्ता सिर्फ भारतीय जनता पार्टी जिंदाबाद करने के लिए हैं? क्या सिर्फ नरेंद्र मोदी जिंदाबाद करने के लिए हैं? क्या वे सिर्फ अमित शाह जिंदाबाद करने के लिए हैं। भाजपा नेतृत्व की नैतिकता कहां गई? उनके लिए अब सिर्फ कुर्सी महत्वपूर्ण हो गई है। हर हाल में जीत चाहिए। सत्ता चाहिए। दलितों के वोट के लिए मोदी ने जो किया, वह शाहबानो प्रकरण से तनिक भी कम नहीं है। तीन तलाक या एससीएसटी विधेयक, ये सभी उन वर्गों को न्याय दिलाने के लिए नहीं, जो कि इसके पीड़ित हैं, अपितु ये सारी कवायद इसलिए की जा रही है कि वर्ष 2019 में फिर से सत्ता पर काबिज हो सके। इसलिए अब सवर्ण कार्यकर्ताओं को सोचना है कि वह अपने साथ हुए विश्वासघात का प्रतिकार किस तरह से करते हैं। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को इसकी सजा जरूर मिलनी चाहिए। और यह सजा 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के रूप में हो सकती है।