कांग्रेस : इज्जत वाली हार भी नसीब नहीं।

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नई दिल्ली। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का पूर्वोत्तर में भी सूपड़ा साफ हो गया। इस करारी हार के बाद अब वह सिर्फ चार राज्यों में सिमट कर रह गई है। गुजरात में हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश की तिकड़ी के सहारे थोड़ी इज्जत वाली हार मिल गई थी, लेकिन पूर्वोत्तर में तो वह इज्जत वाली हार भी नसीब नहीं हुई है। गुजरात में हार के बाद फुलाया गया ‘इज्जत वाला’ गुब्बारा पूर्वोत्तर में बुरी तरह फूट गया। मेघालय में सबसे ज्यादा सीट जीतने के बाद भी सत्ता हाथ नहीं लगी।

कांग्रेस के दिन खराब चल रहे हैं। वह हीरा छूने की कोशिश करती है, पर हाथ कोयला लगता है। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि चाल चलने वाले सारी उलटी चाल चल रहे हैं। तीन तलाक बिल को राज्यसभा में रोकना हो या फिर जीएसटी को गब्बरसिंह टैक्स बताना, ये सब उलटी चालें ही थीं, जो कि कांग्रेस की ओर से चली गईं। इन उलटी चालों के परिणाम भी नकारात्मक रहे, और कांग्रेस को हार-पर-हार मिलती रही। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद गुजरात में थोड़ी इज्जत वाली हार नसीब हुई थी। इस हार से कुछ सीख लेने के बजाय कांग्रेसियों ने इसे अपनी जीत बताते हुए इसका अपने पक्ष में महिमामंडन करना शुरू कर दिया। गुजरात में हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश की तिकड़ी के सहारे जो कुछ भी हासिल हुआ था, वह सब त्रिपुरा और नागालैंड में लुट गया। इन दोनों राज्यों में उसे एक भी सीट नहीं मिली। यानी गुजरात में मिली थोड़ी इज्जत वाली हार का गुब्बारा पूर्वोत्तर में फूट गया। वहां उसे इज्जत वाली हार भी नसीब नहीं हुई है। मेघालय में तो सीटें ज्यादा मिलने के बाद भी सत्ता हाथ से फिसल गई।