अथ पकौड़ा पुराण।

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अपने पीएम साहब यानी कि नरेंद्र मोदी जी पकौड़े का शोशा छोड़कर चार देशों की यात्रा पर विदेश चले गए और विरोधी दलों के नेता उनकी जाल में उलझकर पकौड़े तलने में मशगूल हो गए। मैं भी पकौड़े की किस्मत देख उसके बारे में सोचने लगा और सोचते-सोचते फ्लैशबैक में चला गया।  

बात उन दिनों की है, जब मैं अमर उजाला मेरठ के फीचर डिपार्टमेंट में था। बाल कवि श्री योगेन्द्र कुमार ‘लल्ला’ तब इस डिपार्टमेंट के हेड हुआ करते थे। श्री हरिशंकर जोशी, नरेन्द्र निर्मल, महेश रस्तोगी अपने-अपने फीचर पेज देखा करते थे। पेज का लेआउट डिजाइन आदि देखने की जिम्मेदारी सुशील कुमार राणा की थी। चंद्रकिरण भारद्वाज पेज बनाया करते थे। हमलोग प्रतिदिन परतापुर से ब्रेड पकौड़ा तथा दिल्ली चुंगी के बीकानेर स्वीट्स से रसगुल्ला मंगवाकर खाया करते थे। इसके लिए डिपार्टमेंट में कार्यरत हर शख्स एक निश्चित राशि कंट्रीब्यूट करता था। यह क्रम सालों तब तक चलता रहा, जब तक फीचर डिपार्टमेंट नोएडा शिफ्ट नहीं हो गया।
सभी फीचर पेजों का दिन शिड्यूल तय था। सभी लोग तय शिड्यूल पर अपना पेज बनवाया करते थे। खेल का पेज रविवासरीय का अंतिम यानी चौथा पन्ना हुआ करता था। तब इस पेज को बनवाने की जिम्मेदारी एडिटोरियल डिपार्टमेंट के उस शख्स की थी, जो अमर उजाला का डेली खेल पन्ना देखा करते थे। फीचर डिपार्टमेंट में आकर उस शख्स की रूह कांप जाया करती थी। उस शख्स का खेल पेज तब तक नहीं बनता था, जब तक वह  ब्रेड पकौड़ा और रसगुल्ले की कीमत अदा नहीं कर देता था। एेसा हर उस दिन हुआ करता था, जिस दिन उस शख्स का पेज शिड्यूल होता था। कभी-कभी आजिज आकर उस शख्स ने लल्ला जी से भी शिकायत की, लेकिन उन्होंने भी उस शख्स की शिकायत को हंसी में टाल दिया। इसके बाद उस शख्स ने भी हथियार डाल दिया तथा हर उस दिन अनमने मन से ब्रेड पकौड़ा मंगवाता रहा, जिस दिन उसके पेज का शिड्यूल हुआ करता था।