बंद कीजिए हिन्दू-मुस्लिम!

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​देश का मूड बदल रहा है। लेकिन, देश में पार्टी-पॉलिटिक्स करने वाले पत्रकार देश में हो रही घटनाओं को देखकर भी अपनी आंखें मूंदे हुए हैं। वे देश में होने वाली घटनाएं क्या संकेत दे रही हैं, समझने को तैयार नहीं हैं। देश का अधिकतर हिन्दू कट्टर होता जा रहा है। वे देश में घटने वाली छोटी-बड़ी सभी घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने लगे हैं। सोशल साइट्स इसके प्रमाण हैं। एेसा क्यों हो रहा है, इसको न तो कांग्रेस समेत गैर भाजपा विरोधी दल समझ रहे हैं और न ही वे पत्रकार इसको समझने के लिए तैयार हैं, जिनकी पत्रकारिता भी सिर्फ भाजपा विरोध में ही चलती हो।  राजस्थान के राजसमंद की घटना को ही लें। इसमें शम्भू रैगर नाम के व्यक्ति ने एक मुस्लिम को नृशंसता से काटकर उसके शव को पेट्रोल छींटकर जला दिया था। उसने ऐसा क्यों किया, इसका खुलासा बाद में हो गया। लेकिन, घटना का वीडियो सामने आते ही इसे जिस तरह से हिन्दू-मुस्लिम कर दिया गया, उससे पूरे देश में बवाल हो गया। धर्म निरपेक्षता का झंडा उठाने वाले दल और पत्रकार हिन्दूवादी संगठनों को गरियाने लगे। एक चैनल के वरिष्ठ पत्रकार, जो कि मोदी विरोध का भी झंडा उठाए हुए हैं, ने अपने फेसबुक एकाउंट पर यह लिखकर एक समुदाय विशेष के लोगों को भड़काने की कोशिश की कि ‘एक हिन्दू ने एक मुस्लिम को मार दिया।’ इसी तरह कांग्रेस समेत भाजपा विरोधी तमाम दलों ने इस घटना को काफी तूल दिया। इसकी परिणति यह हुई कि इस घटना के तीसरे दिन मुस्लिम समाज के लोगों ने उग्र प्रदर्शन किया। जो नहीं बोलना चाहिए था, वह सब बोला गया। यहां तक कहा गया कि ‘हिन्दुस्तान में रहना होगा, अल्ला हो अकबर कहना होगा।’ एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले इस देश में अस्सी प्रतिशत आबादी वाले जमात को इस तरह ललकारना क्या उचित था? इसकी प्रतिक्रिया हुई। दो दिन बाद ही हिन्दू भी एकजुट हो गए। पूरे राजस्थान में जमकर प्रदर्शन हुआ। विरोध में नारेबाजी हुई। इसी तरह न्यूज एटिन इंडिया पर आर-पार में तीन तलाक से संबंधित बिल पर डिबेट के दौरान कांग्रेस समर्थक आचार्य प्रमोद कृष्णन ने स्पष्ट तौर पर यह कहा कि सरकार ने तीन तलाक बिल लाकर मुस्लिम समुदाय के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप किया है। सरकार के इस कदम का मुस्लिमों को उग्र विरोध ( उपद्रवी होने) करना चाहिए था। आचार्य के इस उकसावे पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने कोई प्रतिक्रया नहीं दी, अन्यथा आचार्य ने तो आग लगाने का पूरा काम कर ही दिया था। यहां उस पत्रकार और उस आचार्य महोदय से यह पूछना जरूरी है कि वे दोनों इस तरह का बयान देकर देश को कहां ले जाएंगे? मामले को शांत करने के बजाय वे दोनों एक समुदाय विशेष को क्यों भड़का रहे थे? धर्म निरपेक्षता की आड़ लेकर वे किसका भला कर रहे थे? क्रिया की प्रतिक्रिया होगी तो क्या होगा?  देश का मूड बदल रहा है। हिन्दू अब उग्र होने लगे हैं। कुछ घटनाओं से इसके साफ संकेत मिल रहे हैं। अस्सी फीसद हिन्दू में कितने प्रतिशत धर्म निरपेक्ष होंगे? दस से बीस प्रतिशत। यदि साठ प्रतिशत हिन्दू भी विरोध में उतर आए तो क्या होगा? खून-खराबा। इसका नतीजा क्या होगा? कथित धर्म निरपेक्ष पत्रकार इसे समझने को तैयार नहीं हैं। ये मैदान में आएंगे नहीं, पर आग लगाएंगे। धर्म निरपेक्षता की आड़ लेकर हिन्दू समुदाय का विरोध करना किसी समुदाय के हित में नहीं है। किसी पार्टी से विरोध हो तो पूरे हिन्दू समुदाय का विरोध करना उचित नहीं है। वे क्या चाहते हैं कि हिन्दुस्तान भी हिन्दुओं का पाकिस्तान बन जाए। नहीं न, तो फिर दोनों समुदायों के साथ ही हम पत्रकार और राजनीतिक दलों को संयम से काम लेना होगा। वोट की राजनीति बंद करनी होगी, नहीं तो जो होगा, वह बहुत भयावह होगा।