मैं आज़ाद हूं!

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अभिव्यक्ति के नाम पर आजकल गाली देने का फैशन चल पड़ा है। पत्रकारों में भी यह रोग लग गया है। तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखने वाले पत्रकार अब गाली देकर अपनी बात रख रहे हैं। मोदी सरकार से पहले पत्रकारों को इस तरह गाली लिखते हुए नहीं देखा था, लेकिन अब वे खूब गाली लिख रहे हैं। दूसरे के बाप को खूब गरिया रहे हैं। यह क्या है? क्या गाली देने की तालीम हम पत्रकारों को अपने घरों से मिली थी? क्या हमारे माता-पिता ने हमें गाली देना सिखाया था? नहीं न, तो फिर हम पत्रकार गालियों से बात क्यों करने लगे हैं? क्यों हम कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवाणी, मनीष शर्मा और रणदीप सुरजेवाला बन रहे हैं? इन सबका तो अपना एजेंडा है, फ्रसटेशन है। आपका भी कोई एजेंडा है तो आप पत्रकारिता की आड़ लेकर यह सब क्यों कर रहे हैं? पत्रकारिता छोड़कर इन लोगों की बिरादरी में खुलकर शामिल हो जाइए और खूब गाली बकिए। पत्रकारिता की चादर ओढ़कर गाली देना शोभा नहीं देता है।

कांग्रेस की सरकार थी, तब पत्रकार लोग गाली नहीं देते थे। अब सरकार कांग्रेस की नहीं है, पत्रकार अब अपनी बात रखने के साथ ही दूसरे के बाप को गालियां दे रहे हैं। उनके इस बदले नजरिए से यह तो स्पष्ट हो रहा है कि वे इस सरकार से बहुत ही नाराज़ हैं। क्यों नाराज़ हैं, यह कोई भी व्यक्ति समझ सकता है। पिछली कांग्रेस सरकार उन्हें बहुत कुछ दे रही थी, जो इस सरकार के आते ही बंद हो गई है। परोसी हुई थाली के छिन जाने का दर्द कितना और कैसा होता है, हर आम-ओ-खास आदमी बखूबी समझ सकता है। यह सब फ्रसटेशन है। मिलती हुई चीज बंद हो जाए तो या तो रोएंगे या फिर गालियां देंगे। सबके सामने रो नहीं सकते तो गालियां ही दे लें। और तो कुछ बस में नहीं है। जो कुछ बस में है, वही कर रहे हैं।