उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में पुन: भड़की जातीय हिंसा निश्चित ही चिंता बढ़ाने वाली है। इस हिंसा में दलित समुदाय के एक व्यक्ति की मौत हो गई। मंगलवार को बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने तनावग्रस्त गांव शब्बीरपुर गांव का दौरा किया। आते-जाते रास्ते में भी कुछ जगहों पर उन्होंने लोगों को संबोधित भी किया। इसी दौरान दलित और राजपूत समुदाय के लोगों के बीच टकराव फिर भड़क उठा। गौरतलब है कि इन दोनों समुदायों के बीच झगड़े की शुरुआत पिछले पांच मई को महाराणा प्रताप शोभा यात्रा निकालने को लेकर हुए विवाद से हुई थी। लेकिन सहारनपुर शहर और आसपास के क्षेत्रों में तनाव उसके पहले से है। पिछले महीने आंबेडकर शोभा यात्रा निकालने को लेकर दलित और मुस्लिम समुदायों में विवाद हुआ था। उसी दौरान सहारनपुर के एसएसपी के घर पर तोड़फोड़ की बहुचर्चित घटना हुई थी।

तमाम घटनाओं के सिलसिले को ध्यान में रखें, तो सहारनपुर में सवा महीने से भी अधिक समय से सामुदायिक तनाव जारी है। इनमें एक पक्ष दलित समुदाय है। स्थानीय पर्यवेक्षकों ने इसका कारण दलित समूहों के भीतर राजनीतिक नेतृत्व कायम करने के लिए जारी प्रतिस्पर्धा को माना है। इसे बसपा के घटते असर का परिणाम भी बताया गया है। गुजरे वर्षों में दलितों का एक हिस्सा भाजपा की तरफ झुका। इससे दलितों के बीच प्रभाव बढ़ाने की होड़ बढ़ी है। मुस्लिम समुदाय को खुद से जोड़ने की बसपा की कोशिशों से दलितों का एक हिस्सा खफा हुआ। इससे भाजपा के लिए अनुकूल स्थितियां बनीं। लेकिन दलित हितों को बढ़-चढ़कर जताने की होड़ का नतीजा यह है कि सवर्ण जातियों के प्रति भी उनमें आक्रामकता आई है। भाजपा की मुश्किल यह है कि वह ना तो सवर्णों को नाराज कर सकती है, ना दलितों को। इन परिस्थितियों में खासकर युवा दलितों में एक नई धारा पैदा होने के संकेत मिले हैं। कुछ समय पहले सहारनपुर में ‘भीम सेना नामक संगठन बना। उसने दलित हितों और भावनाओं को धारदार ढंग से अभिव्यक्ति दी। उसकी ताकत कितनी बढ़ चुकी है, इसका अंदाजा पिछले रविवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर लगा, जब उसके नेता चंद्रशेखर आजाद रावण के आह्वान पर हजारों दलित वहां इकट्ठे हो गए। वो कई राज्यों से आए थे। दरअसल, इस संगठन के कारण दरकते आधार का आभास ही था कि आखिरकार मायावती सहारनपुर गईं। लेकिन इस क्रम में वहां सुलगती हालत फिर से भड़क उठी है।

स्पष्टत: सहारनपुर की स्थिति को संभालना उत्तर प्रदेश सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है। जातीय हिंसा की यह आग अन्य इलाकों तक न फैले, इसका खयाल रखना सर्वाधिक जरूरी है। सहारनपुर में कानून को स्वंतत्र और निष्पक्ष ढंग से अपना काम करने दिया जाना चाहिए। इसके साथ-साथ पहल राजनीतिक स्तर पर भी करनी होगी। वोट बैंक की प्रतिस्पर्धा सामाजिक सामंजस्य को भंग ना कर दे, इसे सुनिश्चित करना होगा।